"उसने तो उड़ना सीखा था!"(कविता)
वह कहीं बैठ डाल पर गीत सुनाए,
देख उसके कदम, दिल झूम जाए,
वह हल्की हवा एक आंगन की,
वह मासूम कली अपने वन की।
देश विदेश वह जाती थी,
चुग कर दाना ले आती थी,
एक शाम दावत का हुआ ऐलान,
शिकारी आ गए बन मेहमान।
कोई नहीं था साथ में उसके,
रह गई वह कांटो में घिर के,
क्या बिगाड़ा उसने जो उसका घोंसला तोड़ दिया?
पंख काट, हौसला उसका छीन लिया।
उस पंछी ने तो उड़ना सीखा था,
शायद किस्मत का पन्ना ही फीका था,
बिना उड़े वह फिर भी चलती गई वहां,
उम्मीद थी उसे, मिलेगा इंसाफ जहां।
वह रास्ता तो अनजाना था,
अपना पराया उसने नहीं पहचाना था,
राही भी देख उसे कहीं और मुड़े,
कहां जाए ! इस कश्मकश में कई दिन ढले।
वह चिड़िया एक दिन थक हार गई,
उस में जीने की हिम्मत जब रही नहीं,
वह सुरीली तान जमी पर लड़खड़ा गई,
उसके चहकते महकते बाग में खामोशी छा गई।
"जब जंग थी इंसाफ की,
सिर्फ न्याय की गुहार थी!
मिलनी थी मुजरिम को सज़ा,
फिर क्यों बेगुनाह को मौत मिली?"
***
-साक्षी शाह

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