खेल जीवन के खेले जाऊँ,
पग पग पीछे ले जाए है..
कभी दे फेंक उछाल कर कोने में,
कभी राख होने तक जलाए है |
है माटी पास, मैं बनाऊँ गागर..
जल हर क्षण फिर भी रिसता जाए है..
कोसू हाथ की कला को देख..
प्रयास पराजित कहलाए है |
दर्पण के समक्ष जो आ जाऊँ,
सोचू कौन किसे बहलाए है..
मुख पे ओढ़ूँ मुस्कान हर घड़ी..
अश्रु मन का सौंदर्य बन जाए है..
खेल जीवन के खेले जाऊँ...
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- Sakshi Shah

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